Saturday, 19 August 2017

कुछ बूंदें - -

कुछ बूंद उन शबनमी निगाह के,
कुछ दर्द मेरे सीने के, यही
सब तो हैं ख़ूबसूरत
वजूहात, बिंदास
मेरे जीने के।
वो आज
भी है दिलकश ओ हंसीं, पहले से 
बेशतर कहीं, उस जादुई -
रूमान से, यूँ दिल
मेरा भी, 
बेअसर
नहीं।
अभी अभी तो सजी है, मजलिस -
ए -आसमां दूर तक. बढे और
ज़ियादा हौले - हौले,
जज़्बात ए
कारवां
दूर तक। तिलस्म - ए - निगाह
का अभी रसूख़ ओ असर
बाक़ी है, अभी तो है
सिर्फ़ आग़ाज़
ए शब,
अभी कामिल सहर बाक़ी है - - -

* *
- शांतनु सान्याल

 







Sunday, 6 August 2017

दुनिया की सच्चाई - -

सजल पलकों के किनारे, ये कैसा
शहर बसा गया कोई। सरहद
पार करने की तमन्ना
निकली बहोत ही
महलक,
सुबह से पहले, चारों तरफ़  कँटीले
तार, लगा गया कोई। उमर
इन ख़्वाबों की कभी
लम्बी होती
नहीं
कांच की तरह, रेशमी पंख ओढ़ने -
से पहले जिस्म ओ जां जगा
गया कोई। ये सर ज़मीन
ही मेरा है, पहला और
आख़री पनाहगाह,
आईने की
तरह
बेबाक, मयार ए  हैसियत बता - -
गया कोई। मुझे अपने
तजुर्बा ए ज़िन्दगी
पे बेहद नाज़
था लेकिन -
चंद
बूंदों में सिमटी हुई, दुनिया की
सच्चाई दिखा गया कोई।

* *
- शांतनु सान्याल




 

Wednesday, 2 August 2017

अभी तो रात बाक़ी है - -

लौटते कभी नहीं उद्गम की ओर, बहुत नाज़ुक
होते हैं नेह के धारे, ढलानों का मोह भुला
देता है धीरे - धीरे,  बचपन के सभी
मासूम किनारे । हर शख़्स
यहाँ है खोज में,  कोई
न कोई दरख़्त
सायादार,
चंद लम्हात के हैं सभी अनुबंध, फिर ख़ूबसूरती -
से हो लें दरकिनार। न जाने कहाँ उड़ा ले
जाए, इन मौसमी हवाओं का कोई
ऐतबार नहीं, उगते सूरज के
सभी हैं पैरोकार यहाँ,
अंधकारमय  राहों
का यहाँ
कोई मददगार नहीं। सुबह की तलाश तनहा चले
बदस्तूर, कारवां नहीं देखता मुड़ कर घायल
मुसाफ़िरों को, इन्क़लाब, ख़ुद तलाशती
है भीड़ में, लहूलुहान हाथों में लिए
हुए जलते मशाल, उन जांबाज़
सिरफ़िरों को।

* *
- शांतनु सान्याल