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Sunday, 7 May 2017

उन्मुक्त अभियान - -

रिश्तों के ग्राफ, सागरमुखी नदी,अहाते
की धूप, स्थिर कहाँ होते हैं, मौसम
के साथ बदल जाते हैं अपना
रास्ता, कुछ उकताहट,
कुछ मीठापन
रह जाता
है अपने साथ। यूँ तो बड़ी नज़ाकत से -
उसने, दिल के संदूक में तह किया
था मेरे हिस्से के रौशनी को,
लेकिन वक़्त ने आख़िर
छोड़ दी सिलवटों
के निशान।
जो भी
हो अच्छा लगता है नाज़ुक तितलियों का
यूँ हथेली पर आ उड़ जाना, मेघों
का ईशानकोण में उभरना,
अनाहूत नीम सर्द हवाओं
का शाम ढले
धीरे धीरे
बहना। दरअसल ज़िन्दगी को चाहिए कभी
कभी, इक मुश्त कबूतरों की उड़ान,
बहुत दूर, उन्मुक्त अभियान।

* *
- शांतनु सान्याल