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Wednesday, 28 December 2016

रस्म ए ख़ुदा हाफ़िज़ - -

कभी कभी शून्यता बहोत
क़रीब होता है। तमाम
झाड़ फ़ानूस क्यूं
न हों रौशन -
दिल का
कोना फिर भी बेतरतीब
होता है। कभी बिन
मांगे ही मिल
जाए बहुत
कुछ,
कभी इक चाहत पे हो
हज़ार जवाब तलब,
पाने और खोने
के इस
खेल में यक़ीनन सिर्फ़
अपना अपना नसीब
होता है। उनकी
महफ़िल
से हैं
हम बहोत आश्ना,
शमुलियत की
अपनी
अलग है ख़ूबसूरती
लेकिन रस्म ए
ख़ुदा हाफ़िज़
कुछ
अज़ीबोग़रीब होता है।
न कोई दूर, नहीं
कोई दिल के
क़रीब
होता है इस खेल में
यक़ीनन सिर्फ़
अपना अपना
नसीब
होता है।

* *
- शांतनु सान्याल




Saturday, 17 December 2016

नदी - HINDI POETRY

Wednesday, 14 December 2016

অন্তহীন ভাসান - -

 অবশেষে সে ছুঁয়েছে গভীরতম বিন্দু -
 যেন শীতের শেষে ঋতুরাজের
উড়ো চিঠি, অরণ্য গন্ধে
মাখা গোপন হৃদয়ের
লিপি। অন্তত সে
ভুলে নি সেই
উত্তর
দিকের জানালা, হারানো কোন শিহরণ
জড়িয়ে বুকে, সে  রেখে গেছে
অনুরাগের ছোঁয়া উড়ন্ত -
পর্দার গায়ে।তার
পরশে ছিল
অদ্ভুত
কুহকের ছায়া, যেন দেহ ও প্রাণে, ঘিরে 
আছে অদৃশ্য জগতের মায়া। জানি
না তার মুক্ত স্রোতের উৎস,
শুধুই ভেসে চলেছি
সুদূর অজানা
ভাসন্ত
দ্বীপের সমান্তরালে।চার দিকে শুধুই অথৈ
জলরাশি - -  !

* *
- শান্তনু সান্যাল

Wednesday, 7 December 2016

फिर भी अच्छा लगता है - -

वो मिले इक ज़माने के बाद, ये सच है 
लेकिन, आज भी कहीं उनकी
आँखों में है इक मुन्तज़िर 
तिश्नगी।  वक़्त
उतार देता
है हर
इक  मुलम्मा मेरे दोस्त, आईने से - 
शिकायत है बेमानी, न जाने
किस जानिब बह गए वो
तमाम दावा - ए -
वाबस्तगी।
फिर भी
अच्छा
लगता है, इक ज़माने के बाद तुमसे
मिलना ऐ लापता ज़िन्दगी।

* *
- शांतनु सान्याल