16 सितंबर, 2013

मृगतृष्णा या कुछ और - -


ये कैसी अनुभूति है जो खींचे जाए अनजानी
राहों पर, न ज़मीं का अपनापन, न ही
फ़लक की उदारता, बढ़े जा रहे
हैं क़दम न जाने किन
मंज़िलों की ओर,
ये कैसा
सूनापन है ज़िन्दगी में, सजी हुई हैं ख़्वाबों
की दुनिया, फिर भी आँखों में है क्यों
अधूरापन, न तुम्हारे वादों
का ऐतबार, न अपनी
तस्मीम पर है
भरोसा,
दूर तक हद ए निगाह बरस रहे है बादल -
फिर भी दिल की ज़मीं है गिरफ़्त
ए बियाबां, न कोई क़रीब,
न ही कोई दूर, इक
ख़ामोशी है
जो कहना चाहती है बहोत कुछ, लेकिन - -  
अफ़सोस, सुनने वाला मेरे हम -
क़दम कोई नहीं - -
* *
- शांतनु सान्याल


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